गरियाबंद पुलिस पर चाइल्डलाइन आदेश की अनदेखी और प्रतिवादी का पक्ष लेने का आरोप 

“आजकल वर्दी की साख पर लगातार सवाल उठ रहे हैं…

और इसका मतलब यह नहीं कि पहले ऐसे मामले नहीं होते थे… बल्कि अब जनता जागरूक है, लोकतंत्र में ‘गन का तंत्र’ हावी नहीं है, और मीडिया—चाहे डिजिटल ही क्यों न हो—अब ज्यादा सशक्त हो चुका है।

इसी बीच छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के छुरा थाना क्षेत्र से एक बेहद संवेदनशील और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक 8 साल की मासूम बच्ची ‘परी’ अपने ही परिवार और सिस्टम के बीच पिसती नजर आ रही है।

पुष्पांजलि साहू उर्फ परी, उम्र महज 8 साल… जन्म से ही अपनी नानी श्रीमती ललिता बाई साहू के साथ ग्राम परसदा खुर्द में रह रही थी। आरोप है कि उसके पिता रुपत साहू ने पहले उसकी मां को घरेलू प्रताड़ना दी, चरित्र पर सवाल उठाए, यहां तक कि बच्ची को अपना मानने से भी इनकार किया और बाद में दूसरी शादी कर ली।

लेकिन 6 से 7 साल बाद, जब दूसरी शादी से कोई संतान नहीं हुई, तो पिता ने अचानक बच्ची को वापस लेने की जिद शुरू कर दी। बताया जा रहा है कि सामाजिक दबाव और कथित ‘बैठक’ के जरिए बच्ची को उसकी नानी से जबरन छीनकर अपने साथ ले जाया गया।

मामला तब और गंभीर हो गया जब नानी अपनी बेटियों के साथ बच्ची से मिलने गांव करकरा पहुंचीं। पीड़ित पक्ष के अनुसार, बच्ची को कई दिनों से एक ही कपड़े में रखा जा रहा है, उसे ठीक से खाना नहीं दिया जाता, घर के पुरुष उसके सामने बीड़ी और शराब का सेवन करते हैं, और उसे घर के बाहर सुलाया जाता है।

जब नानी ने बच्ची से मिलने की बात कही, तो परी के पिता के परिवार वालों ने गाली-गलौज करते हुए महिलाओं के साथ मारपीट की। इस हमले में नानी और उनकी बेटियों को गंभीर चोटें आईं।

इसके बाद छुरा थाना में शिकायत दर्ज कराई गई। जानकारी के अनुसार 21 अप्रैल को एफआईआर दर्ज करने की बात कही गई, लेकिन सवाल यह है कि इतने दिन बीत जाने के बाद भी आरोपियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

इसी मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर आरोप लगे हैं। आरोप है कि, महिला का बयान पुरुष कांस्टेबल द्वारा लिया गया, जबकि महिला कांस्टेबल मौजूद होने के बावजूद उसे हटा दिया गया। इतना ही नहीं, बयान का वीडियो बनाकर प्रतिवादी पक्ष को भेजने की भी बात सामने आई है—जो जांच का विषय है।

कानूनी पहलू पर बात करें तो महिला का बयान केवल महिला पुलिसकर्मी ही ले सकती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल बाल सुरक्षा को लेकर उठ रहा है। कानून के जानकारों के अनुसार, Childline India Foundation यानी 1098 हेल्पलाइन और Child Welfare Committee (CWC) द्वारा जारी रेस्क्यू आदेश की अवहेलना बेहद गंभीर मामला है—खासकर तब, जब बच्चे की सुरक्षा दांव पर हो। आरोप है कि, चाइल्डलाइन के आदेश के बावजूद पुलिस द्वारा समय अपने अनुसार तय किया गया और रेस्क्यू टीम को सहयोग नहीं दिया गया। यहां तक कि पुलिस बल भेजने से यह कहकर मना कर दिया गया कि ‘मंत्री जी का कार्यक्रम है’।


अब सवाल यह उठता है कि, क्या वीआईपी ड्यूटी के कारण किसी बच्चे की सुरक्षा से समझौता किया जा सकता है? क्या दो पुलिसकर्मी भेजने से थाना असुरक्षित हो जाता है… या फिर लोकतंत्र ही कहीं रसूख के इशारे पर चल रहा है?



विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह चाइल्डलाइन और CWC के आदेश की अनदेखी न केवल सरकारी आदेश की अवहेलना है, बल्कि यह सिविल सेवा आचरण नियमों का भी उल्लंघन है, और ऐसे मामलों में कार्रवाई का प्रावधान है।


अब इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या एक मासूम बच्ची की सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा हो सकता है?

परी की नानी न्याय की गुहार लगा रही हैं… उनकी मांग है कि उनकी नातिन को वापस उन्हें सौंपा जाए और दोषियों पर

 सख्त कार्रवाई हो।